आज्ञा चक्र को तीसरी आंख क्यों कहते हैं। क्या ये भी हमारी दोनों आँखों की तरह देखने का काम करती है।अगर देखती है तो वह प्रत्यक्ष रूप में दिखाई क्यों नही पड़ती है। और अगर देखती है तोक्या देखती है वे तीसरी आंख।
सुरेन्द्र पाल सिंह
आज्ञाचक्र जब सक्रिय हो जाता है तो इससे चिजें दिखाई देने लगती है और यह हमारी दोनों आँखों के बीच में स्थित है इसलिए इसे तीसरी आंख कहते हैं।
हमारे दो शरीर हैं, एक है स्थूल शरीर और दूसरा है शूक्ष्म शरीर। शूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर के पीछे छुपा हुआ है। स्थूल शरीर दिखाई देता है जबकि शूक्ष्म शरीर दिखाई नहीं देता है। तीसरी आंख इसी शूक्ष्म शरीर का भाग है।
हमारी दोनों आंखें स्थूल शरीर का हिस्सा है। ठोस हैं, भौतिक हैं। दिखाई देती हैं और हम इन्हें छू भी सकते हैं लेकिन तीसरी आंख हमारे सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है, अभौतिक है, शूक्ष्म है इसलिए दिखाई नहीं देती है। तीसरी आंख हमारे दूसरे सूक्ष्म शरीर की आंख है जिससे वह देखने का काम करता है। हम सिर्फ दोनों आंखों के बीच में स्पर्श करके इसकी संवेदनशीलता को महसूस कर सकते हैं।
हमारे स्थूल शरीर की दोनों आंखों से हम बाहर के ज्ञात जगत को देखते हैं। इस तीसरी आंख से हम भीतर के अज्ञात जगत को देख सकते हैं। हमारे स्थूल शरीर से देखने के लिए हमारे पास दो आंखें हैं और हमारे दूसरे शूक्ष्म शरीर से देखने के लिए हमारे पास एक आंख है इसलिए भी इसे तीसरी आंख कहते हैं।
तीसरी आंख सक्रिय होती है तो शूक्ष्म शरीर भी सक्रिय होने लगता है और यदि हम शूक्ष्म शरीर को सक्रिय करते हैं तो तीसरी आंख भी सक्रिय होने लगती है। दोनों बातें युगपत घटित होती है। यानि यह वैसा ही है जैसे हमारी आंखें खुल जाती है तो हमरा शरीर नींद से बाहर आ जाता है या कि हमारा शरीर नींद से बाहर आ जाता है तो हमारी आंखें खुल जाती है।
शूक्ष्म शरीर हमारी पकड़ में नहीं आता है तो तीसरी आंख भी हमारी पकड़ में नहीं आती है, लेकिन आज्ञाचक्र हमारी पकड़ में आता है इसलिए शूक्ष्म शरीर को जगाने के लिए आज्ञाचक्र को जगाने वाली साधनाएं प्रयोग की जाती है।
हमारी अधिकतम उर्जा दोनों आंखों द्वारा बाहर देखने में ही खर्च हो रही है। हम सुबह आंख खुलते ही देखना शुरू करते हैं जो रात सोते समय तक जारी रहता है। और रात सोने के बाद स्वप्न देखने लगते हैं । आज्ञाचक्र को जगाने के लिए हमारी दोनों आँखों की उर्जा को बाहर देखने से रोककर भीतर देखते हुए आज्ञाचक्र पर भेजना आवश्यक है।
“आज्ञाचक्र को देखना”
यहां पर कुछ भी नहीं करना है। सिर्फ आज्ञाचक्र को देखना है।
इसके लिए दोनों आंखों को बंद करके दोनों आंखों के बीच में आज्ञाचक्र को देखना शुरू करना है। आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही वहां दोनों आंखें गड़ाकर देखना है। दोनों आंखों को भीतर बीच में आज्ञाचक्र पर ठहरा देना है। आंखें बंद करके भीतर से दोनों आंखों के बीच में देखना है। यानि कि पलकें बंद करने के बाद भीतर से दोनों आंखें आज्ञाचक्र को देख रही हों!
हमारी आंखों से उर्जा बाहर देखने में सतत बह रही है। इस उर्जा को हमें भीतर मोड़ देना है। जब बाहर देखने की जरूरत नहीं होती है तब आंखों को बंद करके आज्ञाचक्र को देखना शुरू कर देते हैं।
ज्यों ही हम दोनों आंखों को बंद करके, दोनों आंखों के द्वारा , दोनों आंखों के बीच में स्थित आज्ञाचक्र को देखते हैं तो हमरी दोनों आंखों की बाहर देखने वाली उर्जा आज्ञाचक्र की ओर बहने लगती है। और आज्ञाचक्र उर्जा के प्रति बहुत ही संवेदनशील है इसलिए वह भी आंखों की उर्जा को अपनी ओर खींचने लगता है और धीरे-धीरे हमारी दोनों आंखें आज्ञाचक्र में ठहरने लगती है और उनकी देखने की उर्जा आज्ञाचक्र में प्रवेश करने लगती है।
आंखों के आज्ञाचक्र में ठहरते ही हमारे विचार भी ठहर जाते हैं और हम निर्विचार होने लगते हैं। विचारों के साथ ही हमारी आंखें भी गतिमान रहती है। जैसे क्रोध का विचार आता है तो आंखें भी क्रोध से तन जाती उनमें खून उतरने लगता है। यही कारण है कि आंखों और विचारों में एक अंतर्संबंध निर्मित हो जाता है और दोनों एक साथ गतिमान रहते हैं। यदि एक की गति रोक दी जाए तो दूसरा भी रूक जाता है। यदि हम आंखों को गति करने से रोक देते हैं। आंखों को आज्ञाचक्र पर ठहरा देते हैं तो हमारे विचार भी ठहर जाते हैं। और इसके उलट यदि हम विचारों को ठहरा देते हैं तो हमारी आंखें भी ठहर जाती है। तभी तो ध्यानी की आंखें ठहरी हुई होती है क्योंकि भीतर उनके विचार ठहर गये होते हैं।
यहां पर हम दोनों आंखों को आज्ञाचक्र पर ठहरा रहे हैं ताकि हमारे विचार भी ठहर जाए। आंखों के ठहरते ही विचार भी ठहर जाते हैं और हम सिर्फ देखने वाले होते हैं। हम अपने को आज्ञाचक्र को देखते हुए पाते हैं, हम अपने को आज्ञाचक्र के साथ ही अपनी श्वास का, दिल की धड़कन का, अपने शरीर की हर क्रिया का साक्षी हुआ पाते हैं और अचानक हम अपने शरीर के प्रति बोध से भर जाते हैं।
जब भी हम आंखें बंद करके भीतर आज्ञाचक्र को देखेंगे तो हमारी दोनों आँखें आज्ञाचक्र पर ठहर जाएंगी और हम निर्विचार होकर देखने वाले हो जाएंगे, साक्षी हो जाएंगे और हमारी बाहर देखने वाली ऊर्जा भीतर आज्ञाचक्र में प्रवेश करने लगेगी।
अपने शरीर के साक्षी होते ही हमें अपने स्थूल शरीर से दूरी महसूस होने लगती है। स्पष्ट अनुभव में आएगा कि शरीर अलग खड़ा है और हम शरीर से अलग खड़े हैं। शरीर से अलग हम शूक्ष्म शरीर में आ खड़े होते हैं। हमें शूक्ष्म शरीर की अनुभूति होने लगती है और हम अचानक अपने आप को शूक्ष्म शरीर में खड़ा हुआ पाते हैं। एक बार शूक्ष्म शरीर अनुभव में आ जाता है फिर तो हम साक्षी होते ही उसमें प्रवेश करते चले जाते हैं। और एक बार शूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने के बाद आज्ञाचक्र पर देखने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि अब ज्यों-ज्यों शूक्ष्म शरीर का अनुभव बढता जाएगा त्यों-त्यों आज्ञाचक्र भी सक्रिय होता चला जाएगा।
अब हम साक्षी होते हैं। अपना शरीर हमें अपने से दूर दिखाई देता है और हम अपने को शूक्ष्म शरीर के तल पर खड़ा हुआ पाते हैं।
यह एक दिन की बात नहीं है। बहुत धैर्य की आवश्यकता होगी। बरसों साधना होगा। सतत प्रयास और गहन संकल्प की जरूरत होगी। शरीर शुद्धि के उपाय, व्यायाम, प्राणायाम और रेचन होता रहे तो साधक को आज्ञाचक्र में प्रवेश करने में सात वर्ष लगते हैं और यदि सघन प्यास और त्वरा से प्रयोग जारी रखते हैं तो थोड़े समय में ही आज्ञाचक्र सक्रिय होने लगता है और हमारा शूक्ष्म शरीर में प्रवेश होता चला जाता है।
स्वामी ध्यान उत्सव