अब इसे ईश्वर की प्रेरणा कहें या मेरे दिमाग की खुराफात।
जितना मैंने पढ़ा है यह उससे अलग नहीं अब है। कुछ पद्धति में छठे भाव को नौकरी का भाव मानते हैं सातवें को व्यापार का, दसवां भाग कर्म क्षेत्र है। कर्म कैसा होना चाहिए कुछ लोग दशम भाव का संबंध जिस भाव से होता है उसी तरह का करम मान लेते हैं।
इसकी व्याख्या आपको अलग-अलग पद्धति में मिल जाएगी। वैदिक पद्धति में दशम भाव के चार कारण बताए गए हैं सूर्य बुध गुरु और शनि
इनमें जो बलवान हो उससे निर्णय करें। दसवें भाव में जैसे ग्रहों का प्रभाव हो उसके अनुसार भी व्यवसाय का निर्णय होता है।
अगर कोई ग्रह ना हो तो दशम भाव का नवा स्वामी नवांश कुंडली में जिस राशि में बैठता है उस राशि स्वामी के अनुसार व्यवसाय ग्रहण करना चाहिए ऐसा निर्देश है।
नाड़ी ज्योतिष में शनि को कर्म कारक माना गया है। शनि ग्रह पर जैसे ग्रहों का प्रभाव होता है वैसा ही कर्म देखने को कई बार मिलता है।
इस तरह के कई विचार हैं नक्षत्रों की बात करें तो पहला नक्षत्र जन्म नक्षत्र और दसवां कर्म नक्षत्र कहलाता है इसके अनुसार भी आप जातक के व्यवसाय का निर्णय कर सकते हैं।
लेकिन नक्षत्र वाली बात चंद्रमा के अंतर्गत आती है। क्या इसी तरह की प्रैक्टिस हम लगने से भी कर सकते हैं अर्थात लग्न किस नक्षत्र में है लेकिन अब लगने की बात करें या लग्नेश की बात करें बहुत विस्तार हो जाएगा।
तीसरा भाव पराक्रम का होता है पराक्रम अर्थात आप क्या काम करते हैं कुछ लोग एक्शन कहते हैं यानी कि जो आपने सोचा और जो आपने किया वह अंतर आपको तीसरे भाव से दिखेगा लेकिन कई बार आपने देखा होगा कि जब आंख में कुछ पड़ जाता है तो हाथ अपने धर्म के अनुसार क्योंकि वह मंगल क्षत्रिय वर्ण को बताता है तो हाथ सदा रक्षा के लिए अथवा उस आंख में गए थे इनके या मच्छर को मारने के लिए उठ जाता है इसी प्रकार जब कोई आप को मारने का प्रयत्न करता है तब भी बचाव में आपका हाथ उठ जाता है क्योंकि यह हाथ का धर्म है यहां पर उसे आज्ञा की आवश्यकता नहीं होती।
इंसान अपने जाति और वर्ण के हिसाब से भी कार्य चलता है।
और पहले भाव से हम जाति और वर्ण का ही विवेचन करते हैं।
अगर इसके अनुसार भी व्यवसाय का चयन किया जाए तो हो सकता है कि कुछ सफलता आपको मिले क्योंकि कई बार जैसे ब्राह्मण का बच्चा पूजा पाठ इत्यादि छोड़ देता है या बनिया अपना बिजनेस करना छोड़ दें और छत्रिय देश की रक्षा करना छोड़ दें तो क्या होगा।
इसीलिए वैकल्पिक चीजें बनी है जो फोर्स में है उन्हें ही क्षत्रिय मान लिया गया है और जो व्यवसाय में हैं वही वैश्य समाज को प्रतिनिधित्व करते हैं।
राशियां भी इन्हीं चार वर्णों में बैठी हुई है।
ब्राह्मण का मतलब हो गया इंटेलेक्चुअल पर्सन अर्थात जो बुद्धिजीवी है और जो दिमाग से काम करते हैं।
इसी हिसाब से अगर हम काम करें तो ज्यादा सफलता मिल सकती है
उम्मीद है आपको मेरा यह लेख पसंद आएगा इसको अलग-अलग हो गई पर लगा कर देखें की कितनी तारतम्यता या कितनी सफलता प्राप्त होती है।
हालांकि व्यवसाय के इतने क्षेत्र हो गए हैं कोई भी नियम लगा ले आप किसी को सलाह तो दे सकते हैं लेकिन वह उस समय में क्या कार्य कर रहा है इसका अनुमान लगाने में फिर भी कुछ ना कुछ चूक हो ही जाती है।
हम उन्हीं नियमों का पता लगा सकते हैं जो एक पैटर्न पर काम करती है जैसे समाज में पहले 18 वर्ष की उम्र शादी के लिए निर्धारित थी जो अब बढ़कर 21 वर्ष हो गई है अगर एज को देखकर और समाज के पैटर्न को समझकर अगर हम ज्यादातर भविष्यवाणी या 18 या 21 साल में होने की संभावना प्रकट करें तो उन में सटीकता मिलती है।
जो चीजें पैटर्न के अनुरूप नहीं होती उन्हें एनालिसिस करने में हमेशा परेशानी आती है।
ज्योतिष में भी पैटर्न को समझना पड़ता है।
अलग अलग पैटर्न पर कई पद्धतियां काम करती है जिससे टाइम ऑफ इवेंट भी आसपास या कभी-कभी एक्यूरेट आता है।
ज्योतिष तथा समुंदर है। जितना गोता लगाओगे उतने ही मोती मिलेंगे।
पता नहीं यह पोस्ट कितनों को लाभ दे पाएगी पर सोचा लिख दो।
ज्योतिषी पंडित विकास काकड़ा