मृत आत्मायें कहाँ रहती है हमाराशरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है

*** मृत आत्मायें कहाँ रहती है *** हमारा
शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है (1)
पृथ्वी (2) जल (3) तेज (4) वायु (5) आकाश
किन्तु हमारे शरीर में पृथ्वी तत्व कि
अधिकता है,
इसिलिये हम पृथ्वी पर रह पाते है, हमारे
शरीर में
पृथ्वी तत्व कि अपेक्षा दूसरे तत्वों कि
मात्रा न्यून है, अगर हमारे शरीर में अग्नि
तत्व प्रधान होता तो अग्नि हमें
जला नहीं सकती थी, जल तत्व प्रधान
होता तो हम जल में डूबकर भी जीवित रह
सकते
थे ।
जैसे हमारे शरीर में पृथ्वी तत्व प्रधान है
वेसे ही आत्माओं में वायु तत्व प्रधान
होता है। वायु को हम
सिर्फ महसूस कर सकते है देख नहीं सकते ।
वायु तत्व
कि प्रधानता के कारण आत्मायें हमें
दिखाई नहीं देती।
इनकि चलने कि गति भी वायु कि तरह तेज
होती है ।
जैसे हम पृथ्वी तत्व कि प्रधानता वाले
पृथ्वी लोक में
रहते है, वेसे ही समस्त आत्मायें वायुमण्डल में
विद्यमान
रहती है, हमारे संसार कि तरह वायु मण्डल
में
इनका भी संसार बसा हुआ है । एवं समय आने
पर ईश्वर
कि इच्छा से यह पृथ्वी पर शरीर धारण
करती रहती है
। मृत आत्माओं को हम भूत प्रेत इत्यादि के
नाम से
भी जानते है । प्रेत योनि कुकर्मों के
कारण कष्ट भोगने
के लिये मिलती है । प्रेतों को भूख लगती
है किन्तु यह
खा नहीं सकते क्यों कि इनका मुख सूई कि
तरह
छोटा होता है। प्यास लगती है पर पानी
नहीं पी सकते, एक मानव शरीर में भोग
कि जितनी भी इच्छायें होती है वह सब
प्रेतों को भी होती है किन्तु प्रेत इनका
भोग नहीं कर
सकते, इन इच्छाओं के पूर्ण नहीं होने के
कारण यह तडपते
रहते है ।
मानव के शरीर में केसे प्रवेश करते है प्रेत
आपने बहुत सारे व्यक्तियों पर प्रेत का
आवेश देखा होगा ओर जिन्होने नहीं देखा
है वो मेंहदीपुर
बालाजी के धाम में जाकर देखे, वहाँ एसे
सैंकडों व्यक्ति मिलेंगे । इन व्यक्तियो पर
प्रेत का आवेश
देखकर एक प्रश्न सभी के मन में उठता है कि
एक शरीर में
तो केवल एक ही आत्मा रह सकती है तो
यह दूसरी इसके
शरीर में केसे प्रवेश कर गई ? दरअसल प्रेत
केवल एक वायु है, जैसा कि आपने पिछले लेख
में जाना । ये व्यक्ति के शरीर के नव
छिद्रों में से कहीं से भी मानव शरीर में
प्रविष्ट
हो सकते है । क्यों कि वायु एक सूई के
बराबर के छिद्र
में भी प्रवेश कर सकती है । शरीर में प्रवेश
करने के बाद
यह मानव के मन पर अपना प्रभाव डालते है,
या यूँ समझ
लिजिये कि ये मन में अपना रहने का स्थान
बनाते है
क्यों कि हमारा शरीर वही कार्य
करता है जो हमसे
हमारा मन करवाना चाहे, जब तक मन कि
स्वीकृति नहीं होती तब तक हम उस
कार्य
को नहीं करते है । ज्योतिष में प्रेत बाधा
के लिये राहु
ओर चन्द्र कि युति को कारण माना गया
है
क्यों कि राहु काली छाया है ओर
चन्द्रमा हमारा मन
है । जिसका मन कमजोर होता है वो इन
प्रेतों के
चक्कर में बडी आसानी से फस जाता है ,
कुण्डली में चन्द्र
के साथ राहु केतु,
या चन्द्रमा पापकर्तरि में हो, या केमद्रुम
योग में हो,
या अमावस्या का जन्म हो,
या कृष्ण पक्ष का बलहीन चन्द्र हो तो
आप प्रेतबाधा के शिकार हो सकते है ।
मानव के मन में प्रवेश करने के बाद ये अपनी
अतृप्त
इच्छाओं कि पूर्ति करते है । जैसे किसी
को भूख
कि वासना है तो वह इतना भोजन करेगा
जितना 10
मनुष्य मिलकर करते है । किसी को कपडे
या किसी भी वस्तु कि कामना होने पर
यह शरीर में
प्रविष्ट होकर उन वस्तुओं कि माँग करते है
, किसी को सिगरेट, चिलम पीने का
शोक होता है,
तो किसी को सुगन्धित इत्र लगाने का।
कई बार यह
शारीरिक वासना कि पूर्ति के लिये
सुन्दर
स्त्रियों को अपना शिकार बनाते है।
या स्त्री कि आत्मा हो तो पुरूष को
शिकार
बनाती है। ओर शरीर में प्रविष्ट होकर
अन्दर
ही अन्दर से इंसान को खोखला कर देते है।
प्रेत अशुद्ध ओर गन्दे रहने वाले व्यक्ति को
जल्दी ही पकड लेते है। क्यों कि गन्दगी
इनको अत्यन्त प्रिय है । जो व्यक्ति कई
दिनों तक नहाता नहीं हो, या दातुन
नहीं करता हो, खाने के बाद मुख में जल
डालकर
कुल्ला नहीं करता हो,
जो स्त्री रजस्वला होने के बाद प्रेत
संभावित स्थानों पर भ्रमण करती हो,
जो मीठा खाने के बाद बिना मुख साफ
किये घर से बाहर
घूमने के लिये निकल जाये , यह सब प्रेतों के
प्रभाव में
शीघ्र ही आते है । तुलसीदास जी जब
शौच के लिये जाते
थे तो आते समय लोटे में बचा हुआ जल एक
आँकडे के पेड में
डाल देते थे तो कुछ दिनों बाद उस आँकडे के
वृक्ष से एक
प्रेत प्रकट हुआ । प्रेत ने उनसे कुछ माँगने को
कहा ,
तो तुलसीदास जी ने पूछा कि तुम मुझे ही
क्यों देना चाहते हो, प्रेत बोला कि मैं
आपके
द्वारा इस पेड में अपवित्र जल दिये जाने से
मैं तृप्त
हो गया हुँ। मैं कईं दिनों से प्यासा था।
बाद मैं
तुलसीदास जी ने प्रभु श्री राम को पाने
का मार्ग
पूछा ओर प्रेत उन्हे बताकर गायब हो गया।
प्रेत मल
का भक्षण भी करते है। ओर केवल अपवित्र
चीजों को यह
मानव शरीर में बिना प्रवेश किये खा सकते
है। प्रेतों से
बचने के उपाय:–
जिनकी कुण्डली में राहु ओर चन्द्र कि
युति हो उन्हे
गोमती चक्र को सिद्ध करके धारण
करना चाहिये।
शरीर को शुद्ध रखना चाहिये । अपवित्र
अवस्था में बाहर नहीं जाना चाहिये ।
अपने साथ में हमेशा एक हनुमान चालिसा ,
या भगवद्
गीता कि पुस्तक रखनी चाहिये । जिस
घर में प्रेत बाधा हो वहाँ सुन्दरकाण्ड ओर
गीता के पाठ करवाने चाहिये । घर में
गोमुत्र ओर गंगाजल के छींटे देने चाहिये ।
भारत भूषण शर्मा

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