प्रणव ( ॐ ) का रहस्य

पहाड़ी और घने जंगलों वालें क्षेत्रों में उसका घर था | पहाड़ी की तराई में तीस पैंतीस मकानों वाला उसका गाँव था । सभी मकान कच्चे थे | उसी गाँव में छोटा सा तीन चार कमरों वाला उसका कच्चा मकान था जिसमे वह सपरिवार रहता था | वनों में घूमना उसे बहुत पसंद था | उसके घर से लगभग तीन या चार किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी सी नदी बहती थी | नदी का जल कांच के सामान पारदर्शी था | चिकने चिकने पत्थर के छोटे बड़े टुकड़े उस नदी में भरे पड़े थे | उन्हीं टुकड़ों पर से होकर वह नदी छल छल, कल कल करती हुई बहती जाती थी पर्वतों के बीच से | चारो तरफ सघन वन थे | पहाड़ियाँ फैली हुई थी | बहुत हीं सुरम्य स्थान था वह | यह उसका पसंदीदा स्थल था |
उसी नदी के किनारे सघन वनों में एक बहुत हीं घना पीपल का वृक्ष था | वृक्ष के चारो तरफ एक मिटटी का चबूतरा बना हुआ था जिसे उसने हीं बहुत मेहनत से बनाया था | वह नित्य जब भी समय मिलता यहाँ आया करता और इसी पीपल के वृक्ष के निचे बैठ कर आँखें बंद कर ध्यान लगाने की कोशिश करता वह | बचपन से हीं ईश्वर के प्रति उसकी अन्योन्य आस्था थी वर्तमान में बाईस या तेईस वर्ष उसकी उम्र रही होगी |
रविवार का दिन था वह | वह उसी पीपल के वृक्ष के निचे बैठ कर आँखें बंद किये हुए बार बार ॐ ॐ … की ध्वनी उच्चारित कर रहा था | वह ध्यान लगाने की कोशिश कर रहा था | लगभग आधा घंटा गुजरा होगा की अचानक उसे अपने कानों में संन्न्न्न…. संन्न्न्न ….. की ध्वनी सुनाई दी | उसका ध्यान टूट गया | उसने अपनी आँखें खोल दी | वह यह जानने का प्रयास करने लगा की यह ध्वनी आखिर कहाँ से आ रही है | पूरी सजगता से उसने अपने चारों तरफ निरिक्षण किया, किन्तु वह कुछ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर यह ध्वनी आ कहाँ से रही है |
तभी उसकी दृष्टि उपर की और गयी बहुत हीं सूक्ष्म पीले रंग का प्रकाश बिंदु उसे उपर आकाश में दिखाई दिया जो चमकीला था | उसे वह पीले रंग का चमकीला प्रकाश बिंदु धीरे धीरे बढ़ता हुआ दिखाई दिया | कुछ देर वह उस चमकीले प्रकाश बिंदु को देखता रहा | उसे वह चमकीला प्रकाश बिंदु बढ़ते हुए अपनी हीं तरफ आता दिखाई दिया | वह विस्मित था | उसे कुछ भी इसका रहस्य समझ में नहीं आ रहा था | तभी बढ़ते बढ़ते वह प्रकाश बिंदु जो अब बढ़ कर एक मानवीय अंडाकार रूप ले चूका था उसके सामने आ कर स्थित हो गया | अब उस प्रकाश पुंज से चांदी के सामान धवल प्रकाश फूट रहे थे | यह प्रकाश पुंज ठीक उससे तीन फुट पर स्थित था | उसे आँखें खोलने में कठिनाई मह्शूश होने लगी इतना तीव्र प्रकाश फूट रहा था | धीरे धीरे प्रकाश कम होना शुरू हुआ | अब प्रकाश पूर्ण रूप से सिमट चुका था और रह गयी थी मात्र एक मानवीय आकृति | वह मानवीय आकृति एक संत के रूप में प्रकट हुई थी | अचानक हुए इस चमत्कार को देख कर वह बुरी तरह हैरान था |
लम्बी घनी दाढ़ी , लम्बी लम्बी जटायें | आँखों में अद्भुत तेज वाला एक संत आकृति प्रकट हुई थी उसके सामने |
“ काफी दिनों से ध्यान लगाने की कोशिश कर रहे हो तुम |” वह प्रकट हुआ संत बोल पड़े |
“ जी | आप कौन हैं |” उसने पूछा |
“ मैं घूमता फिरता हुआ एक संत हूँ | हिमालय के अदृश्य लोक में मेरी कुटिया है | अक्सर मुझे ध्यान लगाते हुए लोगों का अध्यात्मिक तरंग मिलता रहता है | इधर से गुजर रहा था तो तुम्हारा भी तरंग मुझे मिला | और मैं तुम्हारे सामने आ गया |” संत ने बताया |
“ क्या प्रत्येक ध्यान लगाने वाले व्यक्ति के शरीर से अध्यात्मिक तरंग निकलता है |” उसने पूछा
“ हाँ बिलकुल निकलता है और यह तरंग ध्यान करने वाले को लाभ पहुंचाने के साथ साथ वातावरण को भी शुद्ध करता है |” संत ने कहा |
“ तुम ध्यान लगाने के क्रम में बार बार प्रणव यानी ॐ का जाप कर रहे थे | यह ॐ की ध्वनी तरंग तुम्हारे पुरे शरीर को प्रभावित कर स्वस्थ करता है | इस ॐ के ध्वनी तरंग का प्रभाव विभिन्न ग्रन्थियों पर अनुकूल प्रभाव डालता है | तथा इसका प्रभाव तुम्हारे मष्तिष्क पर भी पड़ता है जिससे तुम आनन्द मह्शूश करते हो | क्या तुम्हें पता है यह ॐ किन अक्षरों के मेल से उत्पन्न होता है |” संत ने प्रश्न किया \
“ नहीं इस बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं यह तो मैं कुछ लोगों को जपते देख और सुन कर जपना शुरू कर दिया |” उसने कहा |
संत मुस्कुराए और बोले |
“ खैर किसी भी तरह तुम्हारे मन में इसे जपने का ख्याल तो आया यही बहुत बड़ी बात है |”
संत ने आगे कहा “ यह ॐ प्रणव कहा गया है तथा यह मूल रूप से तीन अक्षरों के मेल से बना है पहला ‘अ’ दूसरा ‘उ’ तथा तीसरा ‘म’ | इसके बोल कर या मानसिक जाप से तीनों अक्षरों का शरीर के तीन विशेष भागों पर असर होता है |
अच्छा एक काम करो तुम एक लम्बी गहरी सांस लो और छोड़ते हुए जोर से अ अ अ अ….. बोलो | और मह्शूश करो शरीर के किस भाग में स्पंदन हो रहा है |” संत ने निर्देश दिया
उसने वैसा हीं किया |
“ अब बताओ जब तुम अ का उच्चारण कर रहे थे तो शरीर के किस भाग में तुम्हें स्पंदन मह्शूश हो रहा था |”
“मुझे लगता है जब मैं अ उच्चारित कर रहा था तब नाभि के इर्द गिर्द स्पष्ट स्पंदन मह्शूश हो रहा था |” उसने कहा |
“ बिलकुल सही | अ के उच्चारण से पैर के अंगूठे से ले कर नाभि तक स्पंदन होता है विशेष कर मूलाधार चक्र यानी रीढ़ की अंतिम हड्डी के इर्द गिर्द तथा नाभि के पास |”
“अब तुम पुनः गहरी लम्बी साँस ले कर छोड़ते हुए बोल कर उ उ उ उ उ …….उच्चारित करो और मह्शूश करो |
उसने वैसा हीं किया |
“बोलो तुम्हें इसका स्पंदन कहाँ मह्शूश हुआ | ” संत ने पूछा |
“ जी इसका स्पंदन मुझे छाती के दोनों पसलियों के बीच मह्शूश हुआ |” उसने कहा |
“ हाँ तुम ठीक हो उ अक्षर का स्पंदन नाभि से उपर पुरे पेट में , हृदय क्षेत्र में तथा गले के क्षेत्र में मह्शूश होता है खास कर छाती के दोनों पसलियों के बीच |” संत ने कहा |
“ अब तुम इसी तरह आधा मुंह खोल कर म का उच्चरण करो थोड़ी देर मुंह को बंद करके भी भीतर हीं भीतर गुंजन करते हुए म का उच्चारण करना |” संत ने निर्देशित किया |
उसने संत के बताये अनुसार मुंह को खोल कर थोड़ी देर म का उच्चारण किया फिर मुंह को बंद करते हुए फिर पूर्ण रूप से मुंह को बंद करके भी म का उच्चारण किया |
“ बोलो तुम्हें स्पंदन कहाँ मह्शूश हुआ ?” संत ने पूछा |
“ जी मुझे सारे सिर में ख़ास कर चोटी के स्थान तथा दोनों भौं के बिच में स्पंदन मह्शूश हुआ |” उसने बताया |
“ हाँ जब तुम म का उच्चारण करते हो तब इसका स्पंदन पुरे सिर में मह्शूश होता है ख़ास कर सहस्त्रार यानी सिर के छोटी में तथा आज्ञा चक्र यानी दोनों भौं के बीच में |” संत ने कहा |
“ अ , उ तथा म के मेल से बना हुआ है ॐ यानी प्रणव महामंत्र | जो की सारे ब्रहमांड में स्वयमेव हीं उच्चारित हो रहा है बिना किसी साधन के | इसलिए इसे अनाहत या अनहद नाद भी कहते हैं | तब तुम जब ॐ उच्चारित करते हो तब तुम्हारा सारा शरीर हीं एक बार में स्पन्दित होने लगता है | इस स्पंदन का प्रभाव सारे शरीर में स्थित विभिन्न चक्रों पर भी होता है | इससे उत्पन्न स्पंदन से शरीर की नाड़ियाँ भी शुद्ध होने लगती है | भौतिक रूप शरीर के अंदर स्थित विभिन्न तरह के कीटाणुओं और विषाणुओं का भी नाश होता है इस महा मन्त्र के जाप से |”
“ तुम कुछ दिन इसी तरह बोल कर तथा मानसिक रूप से ॐ महामंत्र का जापो करो | जाप करने के बाद शरीर के विभिन्न हिस्सों में हो रहे स्पंदन पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करना | इससे तुम शरीर में स्थित विभिन्न चक्रों पर पहुँच सकते हो | शरीर में स्थित और भी कई राज खुलेंगे | तुम यह प्रयोग नित्य करो |”
ऐसा कह कर वे संत अचानक से हीं गायब हो गये |
उसके सामने एक नया हीं अध्याय खुल चुक था |
( उपरोक्त कथा मात्र ॐ के विभिन्न पहलुओं को समझाने मात्र का प्रयास है । )


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