पांचवें घर को पंचम

👉जन्म कुंडली में पांचवें घर को पंचम भाव कहा जाता है । इसके स्वामी को पंचमेश कहते हैं ।

👉पंचम भाव से पेट , गर्भ , संतान , विद्या , बुद्धि , वाणी , इष्ट देव , मंत्रणा शक्ति , प्रेम , प्रतियोगी परीक्षा , लेखन शक्ति इत्यादि के बारे में विचार किया जाता है ।
👉पंचम भाव का कारक गुरु ( बृहस्पति ) को माना गया है ।
जब कुंडली में पंचम भाव , पंचम भाव का स्वामी एवं गुरु कमजोर या पीड़ित हो जाए तो इनसे संबंधित सुख में कमी एवं परेशानी होती है । यदि सिर्फ एक ही चीज कमजोर या पीड़ित हो तो ज्यादा कमी या परेशानी नहीं होती है ।

👉इष्ट देव का विचार पंचम भाव से किया जाता है । पंचम भाव के स्वामी से संबंधित देवता को इष्ट माना जाता है । जैसे सूर्य – विष्णु जी , चंद्र – शिव जी , मंगल – हनुमान जी , बुध – दुर्गा जी या गणेश जी , गुरु – ब्रह्मा जी , शुक्र – लक्ष्मी जी , शनि – भैरव जी ( ग्रहों से संबंधित देवताओं में अलग अलग लोगों का अलग अलग मत है इसलिए कोई आवश्यक नहीं है कि मेरे द्वारा बताए गए देवता को हीं माने )

👉परंतु मेरा विचार है की अपना इष्ट परम पिता परमेश्वर को मानना चाहिए जो ईश्वर है , और गृहस्थ व्यक्ति को सभी देवताओं की आराधना करनी चाहिए क्योंकि सभी देवताओं से संबंधित शक्ति हमें चाहिए । ईश्वर और देवता में अंतर है ईश्वर को अंग्रेजी में God कहते हैं और देवताओं को अंग्रेजी में Lord कहते हैं । ईश्वर सभी धर्मों का एक हैं होता है , परंतु देवता सभी धर्मों के अलग-अलग होते हैं ।

👉 यदि पंचम भाव बली हो शुभ हो तो दूसरों को मार्गदर्शन करने की योग्यता अच्छी होती है

👉संतान – पंचम भाव पर सूर्य और मंगल का प्रभाव हो तो गर्भ नाश करता है विशेष शत्रु राशि हो , परंतु दूसरे शुभ ग्रहों की दृष्टि से इसमें कमी भी आती है । इस स्थान में बलवान चंद्र अधिक कन्याओं की उत्पत्ति करता है । बुध एवं शनि के पंचम में होने से पुत्र प्राप्ति में विलंब होती है क्योंकि दोनों ठंडे तथा नपुंसक ग्रह
हैं । गुरु इस स्थान में संतान के लिए शुभ नहीं होता है एवं बड़े पुत्र से मतभेद करता है । गुरु इस स्थान में तभी शुभ फल प्रदान करता है जब पापयुक्त , पापदृष्टय या निर्बल ना हो । शुक्र इस स्थान में पुत्र पुत्रियां दोनों देता है । राहु और केतु संतान संबंधी परेशानी देते हैं । ( एक ही ग्रह के फलादेश को आखिरी निर्णय ना मानें । दूसरे ग्रहों की दृष्टि फलादेश में परिवर्तन भी कर देती है । )

👉प्रेम विवाह – पंचम स्थान प्रेमी प्रेमिका का होता है जब इस भाव का संबंध सप्तम भाव या उसके स्वामी से होता है तो प्रेम विवाह होने की संभावना ज्यादा रहती है । प्रेम विवाह के और भी कई योग
होते हैं ।

👉प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए पंचम भाव की स्थिति अच्छी होनी चाहिए ।

👉राजयोग – नवम से नवम होने के कारण पंचम भाव शुभता में श्रेष्ठ होता है चतुर्थ भाव के स्वामी से पंचमेश का संबंध केंद्र या त्रिकोण में राजयोग व धन देने वाला होता है । पंचमेश एवं दशमेश के संबंध को भी राजयोग जैसा माना जाता है ( पंचमेश या चतुर्देश , दशमेश की दूसरी राशि अच्छे भाव में होनी चाहिए )

👉 कुंडली के पंचम भाव से और भी परिवार के विषय में सामान्य जानकारी प्राप्त किया जा सकता है ।
पिता की आयु का भाव होता है । बड़े भाई बहन के जीवन साथी का भाव होता है । जीवनसाथी के आमदनी का भाव होता है , इत्यादि ।

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