नेत्र रोग

ज्योतिष शास्त्र में मानव शरीर के हर अंग से जुडी बीमारी का संबंध ग्रह से बताया है। इनमें नेत्र रोगों का भी सीधा संबंध ग्रहों से है। कुंडली में कुछ ग्रहों की खराब स्थिति की वजह से नेत्र रोग हो जाते हैं और जीवन में परेशानियां उठानी पडती है। जानिये,नेत्र रोग होने के ज्योतिषीय कारण व उचित समाधान-

🔴ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली के दूसरे और बारहवें भाव से नेत्र रोग की संभावनाओं के बारे में पता लगता है।कुंडली में द्वितीय भाव से इंसान की दाहिनी और बारहवें भाव से बायीं आंख संबंधित रोग के बारे में जानकारी पता चलती है।

🟥कुंडली में इन स्थितियों की वजह से नेत्र रोग🟥

🪴जन्मपत्री में ग्रहों की विशेष स्थितियों के प्रभाव से नेत्र रोग होने की संभावनाएं बढती हैं। सूर्य और चंद्र ग्रह को ज्योतिषशास्त्र में नेत्र संबोधित कर सूर्य को दाहिनी और चंद्रमा को बायीं आंख माना है।

🪴अगर किसी जातक की कुंडली में दूसरे भाव में सूर्य हो व बारहवें भाव में चंद्रमा स्थित हो तो ऐसी स्थिति में गंभीर नेत्र रोग होने की संभावना रहती है और आंखो की रोशनी को खतरा होता है।

🪴अगर कुंडली में 6 या 12वें भाव में सूर्य कमजोर स्थिति में हो तो ऐसा इंसान उम्र भर आंखों की बीमारियों से पीडित होता है।

🪴जातक के जन्मांग चक्र में अगर सूर्य प्रथम भाव में और नीच का हो तो वह इंसान गंभीर नेत्र बीमारी से पीडित रहता है।

🪴ज्योतिष में नेत्र रोग का कारण मंगल और शनि को भी बताया है। अगर कुंडली में दूसरे भाव में मंगल और बारहवें भाव में शनि ग्रह है तो जातक को सिर दर्द होता है और इस परेशानी से पीछा छुडाने के लिए चश्मा लगाने के लिए मजबूर होना पडता है।

🪴कुंडली में दूसरे अथवा 12 वें भाव में अगर शनि-मंगल एक साथ आकर युति करते हैं तो इंसान को अंधेपन का सामना करना पडता है।

🪴ज्योतिष अनुसार अगर दूसरे या बारहवें भाव में सूर्य के साथ केतु ग्रह की युति हो तो इस स्थिति में मोतियाबिंद बीमारी के ऑपरेशन का योग बनता है।

🔴नेत्र रोग के ज्योतिषीय समाधान🔴
नेत्र रोग भविष्य में परेशान करें उससे पहले ही ज्योतिषीय समाधान कर लेने चाहिए। अगर कुंडली में नेत्र रोग संबंधित ग्रहों की स्थितियां व योग नजर आए तो संबंधित ग्रहों के उपाय कर लेने चाहिए जिससे नेत्र रोग होने की संभावना बहुत कम रह जाती है।

आंखों की बीमारियां होने में सूर्य ग्रह का प्रमुख योगदान होता है इसलिए सूर्य के उपाय करने चाहिए और नियमित सुबह जल्दी उठकर व स्नान के बाद सूर्योदय होते हुए सूर्य को तांबे के लोटे में जल अर्पित करने चाहिए जिससे कुंडली में सूर्य प्रबल होता है और आंखों की रोशनी भी सही रहती है।
इसी प्रकार मंगल,शनि,केतु ग्रहों के ज्योतिष अनुसार उपाय करते रहना चाहिए जिससे नेत्र रोग होने की संभावना नगण्य रहती हैं।
इस तरह कुंडली में ग्रहों की इन स्थितियों के परिणामस्वरूप नेत्र रोग की संभावनाओं को पूर्व में जाना जा सकता है और नेत्र रोग से बचाव के लिए उपाय किए जा सकते हैं।

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