जो भी जातक इस पृथ्वी नामक मृत्युलोक पर जन्म लेता है, उसके जन्म के समय से उसकी जन्म कुंडली बनाई जाती है। वैसे कुंडली तो केवल जन्म होने पर ही नहीं, मृत्यु होने पर भी बनाई जाती है लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी। हाँ तो जैसा कि हम सब अक्सर ही किसी भी बात पर सुनते ही आयें हैं कि “ सब पिछले जन्म के लेन देन हैं” सो इस बात में कहीं कोई किंतु परंतु नहीं है कि हमारा वर्तमान जन्म पिछले जन्मों और उनके कर्मों का प्रारब्ध ही है। वर्तमान जन्म कुंडली में इसे पाँचवें और बारहवें भाव से देखा जाता है। पाँचवा भाव जहां जन्म जन्मांतर को दिखाता है तो वहीं बारहवाँ भाव हमारे वर्तमान जन्म लग्न का बारहवाँ होने के चलते उसका व्यय भाव है। मतलब कि हम किस जन्म का व्यय करके इस जन्म में आयें हैं।
ज्योतिष में एक बड़ी विचित्र बात है जिस पर हम सब गौर नहीं करते कि किसी भी दुर्गम स्थिति से बचने के लिए जातक ज्योतिषी से उपाय पूछता है। उपाय मतलब कि उस दुर्गम स्थिति को टाल पाने के लिए उपयुक्त कर्म। ज्योतिष आपको होने वाली घटना का या आपके भविष्य को अनुकूल करने का अनुमान या उपाय मात्र ही दे सकता है। उपयुक्त कर्म करना फिर भी आपके ही हाथ में होता है।
तो यहाँ सवाल ये उठता है कि ज्योतिष अधिक महत्वपूर्ण है या कर्म? इस प्रश्न का उत्तर नि:संदेह ही कर्म है। जब योगेश्वर कृष्ण अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए कहते हैं “ तू कर्म कर, फल की चिंता मत कर” तो इसके बाद किसी को किसी भी संदेह की कोई जगह ही नहीं रहती। ज्योतिष या शकुन शास्त्र का सहारा तो लेना चाहिए लेकिन कर्मठ पुरुष समय घड़ी की चिंता नहीं किया करते। वैसे भी कहा गया है कि “ शुभस्य शीघ्रम” सो अपनी कुंडली अवश्य दिखाइये लेकिन तभी जब आप किसी दैवज्ञ के बताये अनुसार उपाय या कर्म करने में खुद को सक्षम पाते हैं। आपके लेटे हुए के मुँह में अंगूर कोई नहीं डाल सकता सो कर्म को ही प्रधान मानिये। कर्म में वो शक्ति है जो ईश्वर को भी फल देने पर मजबूर कर देती है। वो कहा गया है ना “वीर भोग्या वसुंधरा” 🙏🙏