जन्मकुंडली का द्वितीय भाव धन स्थान कहलाता है।

जन्मकुंडली का द्वितीय भाव धन स्थान कहलाता है। इस स्थान में जो राशि हो उसका स्वामी धनेश कहलाता है। कुंडली में धनेश जिस भाव में बैठा होता है उसके अनुसार फल करता है।

किस भाव में क्या फल देता है धनेश?

आइए जानते हैं किस भाव में क्या फल देता है धनेश

लग्न में- धनेश यदि लग्न में हो तो जातक को कंजूस बनाता है। ऐसा जातक व्यवसायी, ऐश्वर्यवान, विख्यात और धनी होता है लेकिन कुछ गलत प्रवृत्तियों में भी उलझ जाता है।

द्वितीय में- धनेश यदि द्वितीय भाव में हो तो जातक धनवान, धर्मात्मा, लोभी, चतुर, व्यापारी और उत्तम कोटि का दानी होता है।

तृतीय में- धनेश यदि कुंडली के तीसरे भाव में बैठा हो तो जातक चोरी, ठगी, सतत विवाद करने वाला, कलाहीन प्रवृत्ति का होता है।

चतुर्थ में- धनेश यदि कुंडली के चौथे भाव में बैठा है तो जातक को पिता से लाभ होता है। सत्यवादी, दयालु, दीर्घायु, भवन संपत्ति वाला, उत्तम व्यापारी और परिश्रमी होता है।

पंचम में- पंचम भाव में बैठा धनेश जातक को पुत्र की ओर से उत्तम सुख देता है। ऐसा व्यक्ति सत्कार्य से निरत, कंजूर और जीवन के अंतिम समय में दुखी होता है।

धनेश यदि छठे भाव में बैठा हो तो जातक धन संग्रह करने में तत्पर, शत्रुओं को परास्त करने वाला, भूमि, संपत्ति का मालिक, किसान, प्रतिष्ठित और सेवा कार्य करने वाला होता है।

सप्तम में- सप्तम स्थान में यदि धनेश हो तो जातक भोग विलासी, धन संग्रह करने वाला, श्रेष्ठ प्रेमी, भाग्यवान होता है
अष्टम में- आठवें भाव में बैठा धनेश जातक को पाखंडी, आत्मघाती तो बनाता है लेकिन साथ ही ऐसा जातक भाग्यशाली भी होता है।

नवम में- नवम स्थान में बैठा धनेश जातक को दानी, धर्मात्मा, विद्वान और धार्मिक कार्यो में प्रवृत्त बनाता है।

दशम में- दशम में धनेश बैठा हो तो जातक धनी, भाग्यशाली और देश-विदेश में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

एकादश में- 11वें स्थान में धनेश बैठा हो तो जातक जातक प्रसिद्ध व्यापारी, धनवान, ऐश्वर्यवान होता है।

द्वादश में- 12वें स्थान में धनेश बैठा होने पर जातक के पास धन का अभाव होता है। कृषक और निन्द्य ग्रामवासी होता है।

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