जल के देवता…चंद्रमा…मन के कारक…चंद्रमा… सभी 27 नक्षत्रों के स्वामी चंद्रमा…आदिकाल से ही चांद को लेकर कई धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं चली आ रही हैं. चांद के वजूद और अहमियत को लेकर कई तरह तक दावे किए जाते रहे हैं. युगों-युगों तक चांद इंसानों के लिए रहस्य और रोमांच का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा और आज भी इसके कई ऐसे अनसुलझे रहस्य है जों दुनिया को हैरान करते हैं.
चांद के रहस्यों में सबसे बड़ा रहस्य यही है कि आखिर चांद का जन्म कैसे हुआ. इसके पीछे विज्ञान के अपने तर्क हैं और धर्मग्रंथों की अपनी मान्यताएं. बताते हैं आपको आपको अलग अलग पुराणों में चांद के जन्म के बारे में क्या कहा गया है.
चांद के जन्म का रहस्य
मत्स्य और अग्नि पुराण के मुताबिक चांद की उत्पत्ति ब्रह्मा की कृपा से हुई. कहते हैं जब बह्माजी ने सृष्टि की कल्पना की तो सबसे पहले अपने मानस पुत्रों की रचना की. उनमें से एक मानस पुत्र थे ऋषि अत्रि. ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की पुत्री अनुसुइया से हुआ. ऋषि कर्दम और अनुसुइया के तीन पुत्र हुए. दुर्वासा, दत्तात्रेय और सोम यानी चंद्रमा जिन्हें ब्रह्मा ने तमाम नक्षत्रों, वनस्पतियों, ब्राह्मण और तप का स्वामी नियुक्त किया.
चांद के जन्म से जुड़ी दूसरी कहानी
पद्म पुराण में चंद्र के जन्म की एक अलग ही कहानी है. उसके मुताबिक जब ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्र अत्रि को सृष्टि का विस्तार करने को कहा तो महर्षि अत्रि ने कठोर तप शुरू किया. तपस्या के दौरान महर्षि अत्रि की आंखों से जल की कुछ बूंदें टपकी. प्रकाशमयी बूंदों को दिशाओं ने स्त्री रुप में प्रकट होकर ग्रहण कर लिया, लेकिन प्रकाशमान गर्भ को दिशाएं अधिक देर धारण न कर सकीं. दिशाओं ने गर्भ त्याग दिया जिसे ब्रह्मा ने पुरुष रुप में चंद्रमा बना दिया. कहते हैं चंद्रमा की तब तमाम देवताओं, ऋषियों और गंधर्वों ने स्तुति की और चंद्रमा के तेज से ही धरती पर दिव्य औषधियां पैदा हुईं.
चंद्रमा के जन्म की तीसरी मान्यता
चंद्रमा के जन्म से जुड़ी एक तीसरी मान्यता भी है जिसका जिक्र स्कंद पुराण में किया गया है. इसके मुताबिक जब देवों और असुरों ने क्षीर सागर का मंथन किया तो समुद्र से 14 रत्न निकले थे. उन 14 रत्नों में से चंद्रमा भी एक थे. जिसे शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया था. दरअसल समद्र से निकले विष को लेकर जब हाहाकार मचा तो शिव ने पूरा विष स्वयं पी लिया. जिससे उनका गला नीला पड़ गया. शिव को शीतल करने के लिए चंद्रमा उनके मस्तक पर निवास करने लगे.
चंद्रमा की मौजूदगी का धार्मिक प्रमाण
ग्रह के रूप में चंद्रमा की मौजूदगी का धार्मिक प्रमाण मंथन से पहले का है. स्कंद पुराण में ही कहा गया है कि समुद्र मंथन का मुहूर्त निकालते वक्त चंद्रमा और गुरु का शुभ योग बताया गया था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था. ये सभी कन्याएं 27 नक्षत्रों की प्रतीक मानी जाती हैं. इन्ही 27 नक्षत्रों के योग से एक चंद्रमास पूरा होता है.
चंद्रमा की 27 पत्नियों का सच
चंद्रमा की 27 पत्नियों में सबसे चर्चित नाम रोहिणी का है. सभी नक्षत्रों में भी रोहिणी नक्षत्र को उत्तम माना जाता है. चंद्रमा अपनी पत्नी रोहिणी से सबसे ज्यादा प्रेम करते थे. बुध ग्रह को चंद्रमा और रोहिणी की ही संतान माना जाता है. चंद्रमा, रोहिणी और बुध को लेकर कई कहानियां बेहद मशहूर रही हैं. दरअसल रोहिणी से चंद्रमा का अत्यधिक प्रेम ही उनके लिए सबसे बड़ी मुश्किल बन गया. जिसके बाद चंद्रमा को भीषण श्राप का सामना करना पड़ा.
चांद को कैसे मिला श्राप ?
कहते हैं चंद्रमा अपनी पत्नी रोहिनी से इतना प्रेम करने लगे कि अन्य 26 पत्नियां चंद्रमा के बर्ताव से दुखी हो गईं. जिसके बाद सभी 26 पत्नियों ने अपने पिता दक्ष प्रजापति से चांद की शिकायत की. बेटियों के दुख से क्रोधित दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दे डाला. दक्ष के श्राप के बाद चंद्रमा क्षयरोग के शिकार हो गए. श्राप से ग्रसित होकर चंद्रमा का तेज क्षीण पड़ने लगा. इससे पृथ्वी की वनस्पतियों पर भी बुरा असर पड़ने लगा.
कैसे मिली श्राप से मुक्ति ?
कहते हैं कि संकट की इस स्थिति में भगवान विष्णु ने मध्यस्थता की. विष्णु के हस्तक्षेप से ही दक्ष का गुस्सा कम हुआ जिसके बाद उन्होंने चंद्रमा को इस शर्त पर फिर से चमकने का वरदान दिया कि चांद का प्रकाश कृष्ण पक्ष में क्षीण होता जाएगा. अमावस्या पर चांद का प्रकाश पूरी तरह गायब हो जाएगा लेकिन शुक्ल पक्ष में चंद्रमा का उद्धार होगा और पूर्णमासी को चंद्रमा का तेज पूर्ण रूप में दिखेगा.
आसमान पर चमकता चांद सनातन काल से ही इंसानों को आकर्षित करता रहा है. कहते हैं सभी 16 कलाओं में निपुण चांद का रंग कभी दूध की तरह झक सफेद और दागमुक्त था. फिर उस पर लगे दाग का रहस्य क्या है. कभी पूरी तरह श्वेत दिखने वाला चांद रूप सृष्टि के सबसे अनुपम सौंदर्य का प्रतीक था पर फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने जिसने सफेद चांद के दामन पर दाग लगा दिया. आखिर चमकते चांद पर कैसे लगा कलंक का दाग.
चांद पर कलंक कैसे लगा ?
चांद पर लगे दाग से जुड़ी भी कई पौराणिक मान्यताएं है. कहते हैं भगवान शिव के तिरस्कार से अपमानित होकर सती ने जब यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपनी जान दे दी तो शिव इतने क्रोधित हो गए कि तांडव करने लगे. भगवान शिव ने इसके लिए दक्ष प्रजापति को जिम्मेदार माना और उनका वध करने निकल पड़े. पौराणिक कथाओं के मुताबिक शिव ने दक्ष को लक्ष्य कर अचूक बाण से प्रहार किया. बचने के लिए दक्ष ने मृग का रूप धारण कर लिया. मृग बनकर दक्ष ने खुद चंद्रमा में छिपा लिया. वही मृग रूप चंद्रमा में धब्बे की तरह दिखता है. इसीलिए चंद्रमा का नाम मृगांक भी है. मृग यानी हिरण और अंक का मतलब कलंक या दाग.
चांद को गणेश ने श्राप क्यों दिया ?
चांद पर दाग लगने की एक और कहानी भी काफी प्रचलित है. ये कहानी है गणपति बप्पा यानी भगवान गणेश से चंद्रमा को मिले श्राप की. कहते हैं चंद्रमा को अपने तेज और रूप रंग पर इतना अभिमान हो गया था कि उन्होंने एक बार भगवान गणेश का भी अपमान कर दिया. जिसका नतीजा उन्हें श्राप के रूप में भुगतना पड़ा.
पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार ब्रह्माजी ने चतुर्थी के दिन गणेशजी का व्रत किया था. गणेशजी ने प्रकट होकर ब्रह्माजी को सृष्टि रचना के मोह से मुक्त होने का वरदान दिया. गणेश जी जाने लगे तो चंद्रमा ने उनके रंग रूप का मजाक उड़ाया. चंद्रमा ने गणेश के लंबोदर और गजमुख का उपहास किया. गणेश ने क्रोध में चंद्रमा को बदसूरत होने का श्राप देते हुए कहा जो भी चांद को देखेगा उस पर झूठा कलंक लगेगा.
चांद ने गणेश को कैसे मनाया ?
कहते हैं उसके बाद चंद्रमा ने नारद की सलाह पर गणेश जी का लड्डुओं और मालपुए से पूजा किया तब गणेश जी ने श्राप तो वापस ले लिया पर ये भी कहा कि जो भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चांद देखेगा उसे चांद का कलंक जरूर लगेगा. कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण पर भी समयंतक मणि की चोरी का कलंक इसीलिए लगा था क्योंकि उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन चांद के दर्शन कर लिए थे.
भारतीय फलित ज्योतिष में चंद्रमा को ही मन का स्वामी इसलिए माना गया है क्योंकि चंद्रमा, जल का स्वामी है, इसलिए जहां कहीं भी जल की अधिकता होगी, उसे चंद्रमा प्रभावित करेगा ही क्योंकि ज्वार-भाटा की घटना से ये साबित है कि चंद्रमा जल को आकर्षित यानी प्रभावित करता है और आधुनिक वैज्ञानिकों ने ही ये भी साबित किया है कि हमारे दिमाग का 80% हिस्सा मूलत: जल है। तो यदि चंद्रमा का प्रभाव समुद्र के जल पर पड़ता है, तो निश्चित रूप से मनुष्य के मन पर भी पड़ना ही चाहिए और यदि चंद्रमा का प्रभाव समुद्र में होने वाले बड़े ज्वार-भाटा का कारण है, तो मनुष्य के मन में होने वाले विचारों के ज्वार-भाटा का कारण भी चंद्रमा ही है। इसलिए कुंडली में चंद्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्वपूर्ण होती है।
आधुनिक विज्ञान कहता है कि मानव का दिमाग मूल रूप से 80% पानी से बना होता है और हमारे भोजन द्वारा जीवन जीने के लिए जितनी भी उर्जा ये शरीर उत्पन्न करता है, उसकी 80% उर्जा का उपयोग केवल दिमाग द्वारा किया जाता है क्योंकि शरीर के काम करना बन्द कर देने (सो जाने, बेहोश हो जाने अथवा शिथिल हो जाने) पर भी दिमाग यानी मन अपना काम करता रहता है। यानी मन, मनुष्य के शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी वजह से ये तय होता है कि व्यक्ति जीवित है या नहीं। यदि व्यक्ति का मन मर जाए, तो शरीर जीवित होने पर भी उसे मृत समान ही माना जाता है, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में कोमा की स्थिति कहते हैं और भारतीय फलित ज्योतिष के अनुसार मन का कारक ग्रह चंद्रमा है।
कुंडली में चंद्रमा की स्थिति है महत्वपूर्ण …
किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चंद्रमा की स्थिति अति महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चंद्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चंद्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चंद्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चंद्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चंद्रमा की अपनी राशि है। ( चंद्रमा वृश्चिक में नीच/दुर्बल होता है…) चंद्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।
चंद्रमा का घटता-बढ़ता आकार जिस प्रकार पृथ्वी पर समुद्र में ज्वार भाटा का कारक बनता है उसी प्रकार इसका प्रभाव मनुष्य के तन और मन पर भी पड़ता है। चन्द्रमा जैसे-जैसे कृष्ण पक्ष में छोटा व शुक्ल पक्ष में पूर्ण होता है वैसे-वैसे मनुष्य के मन पर भी चन्द्र का प्रभाव पड़ता है। कुंडली के 12 घरों में चंद्रमा देता है शुभ और अशुभ फल, जानिए विस्तार से….
- पहले लग्न में चंद्रमा हो तो जातक बलवान, ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी, गायन वाद्य प्रिय एवं स्थूल शरीर का होता है।
- दूसरे भाव में चंद्रमा हो तो जातक मधुरभाषी, सुंदर, भोगी, परदेशवासी, सहनशील एवं शांति प्रिय होता है।
- तीसरे भाव में अगर चंद्रमा हो तो जातक पराक्रम से धन प्राप्ति, धार्मिक, यशस्वी, प्रसन्न, आस्तिक एवं मधुरभाषी होता है।
- चौथे भाव में हो तो जातक दानी, मानी, सुखी, उदार, रोगरहित, विवाह के पश्चात कन्या संततिवान, सदाचारी, सट्टे से धन कमाने वाला एवं क्षमाशील होता है।
- लग्न के पांचवें भाव में चंद्र हो तो जातक शुद्ध बुद्धि, चंचल, सदाचारी, क्षमावान तथा शौकीन होता है।
- लग्न के छठे भाव में चंद्रमा होने से जातक कफ रोगी, नेत्र रोगी, अल्पायु, आसक्त, व्ययी होता है।
- चंद्रमा सातवें स्थान में होने से जातक सभ्य, धैर्यवान, नेता, विचारक, प्रवासी, जलयात्रा करने वाला, अभिमानी, व्यापारी, वकील एवं स्फूर्तिवान होता है।
- आठवें भाव में चंद्रमा होने से जातक विकारग्रस्त, कामी, व्यापार से लाभ वाला, वाचाल, स्वाभिमानी, बंधन से दुखी होने वाला एवं ईर्ष्यालु होता है।
- नौंवे भाव में चंद्रमा होने से जातक संतति, संपत्तिवान, धर्मात्मा, कार्यशील, प्रवास प्रिय, न्यायी, विद्वान एवं साहसी होता है।
- दसवें भाव में चंद्रमा होने से जातक कार्यकुशल, दयालु, निर्मल बुद्धि, व्यापारी, यशस्वी, संतोषी एवं लोकहितैषी होता है।
- लग्न के ग्यारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक चंचल बुद्धि, गुणी, संतति एवं संपत्ति से युक्त, यशस्वी, दीर्घायु, परदेशप्रिय एवं राज्यकार्य में दक्ष होता है।
- लग्न के बारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक नेत्र रोगी, कफ रोगी, क्रोधी, एकांत प्रिय, चिंतनशील, मृदुभाषी एवं अधिक व्यय करने वाला होता है।
चंद्रमा का ग्रहण योग बढ़ाता है परेशानी, इन उपायों से दूर होंगी मुश्किलें :
आप की कुंडली मे चंद्र केतु या राहु की युति किसी भी भाव मे अगर साथ बैठे है और 9 अंश से अधिक का अंतर है तो ये ग्रहण दोष ज्यादा प्रभावशाली नहीं होगा.
चंद्र-राहु युति ग्रहण योग राहु की गूढ़ता चंद्र की कोमलता को प्रभावित करती है और व्यक्ति शंकालु, हीन मानसिकता वाला बनता जाता है.
चद्रं राहु युति मानसिक तनाव को बढ़ाती है. परिस्थिति में ढलने की क्षमता कम करती है. ये व्यक्ति जल्दी डिप्रेशन, मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. हिस्टीरिया, मिर्गी जैसे रोग भी देखे गए हैं. यह युति ऊपरी बाधा, गुप्त शत्रु, पानी से खतरा दिखाती है. वैवाहिक जीवन में भी तनाव निर्माण करती है.
अन्य योग प्रबल हो तो चंद्र-राहु की गूढ़ता व्यक्ति को रहस्यकथाओं का लेखक, जादूगर आदि भी बना सकती है.
चंद्र केतु की युति
आप की कुंडली में अगर चंद्र केतु की युति है तो ऐसे जातक को समझ पाना बहुत कठिन होता है. क्यों कि ऐसे में जातक कब क्या कर बैठे ये समझपाना मुश्किल होगा. अगर आप की कुण्डली में ये युति है ?तो आप के लिए उचित रहेगा कि आप किसी भी कार्य को करने से पहले उस पर अच्छी तरीके से विचार कर ले. नहीं तो अपने उसी कार्य के कारण आप का मन दुखी हो सकता है.
लेकिन इस के साथ आप में एक अच्छी quality ये होगी कि आप अपनी गलतियों से सबक लेंगे. और इसी तरह की गलतियों वे बुराइयों को अपने आस पास से भी दूर कर देंगे.
करें ये उपाय- अगर आपकी कुंडली में चंद्रमा और राहु का योग है तो नियमित रूप से भगवान शिव की उपासना करें. सुबह-शाम शिव के मंत्रों का जाप करें. सोमवार के दिन भगवान शिव को जल अर्पित करें. सोमवार के दिन भगवान शिव को खीर का भोग लगाएं और प्रसाद के तौर पर इसे खुद ग्रहण करें
ऐसा करने से चंद्रमा के ग्रहण योग का असर काफी हद तक कम हो जाता है. इसके अलावा पूर्णिमा का उपवास रखना भी फायदेमंद होता है. इस दिन सिर्फ जल आहार लेने से फायदा होता है.
एक सफेद चंदन का छोटा सा टुकड़ा ले लें और उसे नीले धागे में लपेट लें. अब इसे बांधकर शनिवार के दिन अपने गले में धारण कर लें. इससे भी राहु और चंद्रमा का नकारात्मक प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है.
जानें, केमद्रुम योग का किस्मत कनेक्शन
चन्द्रमा पृथ्वी पर सबसे ज्यादा असर डालने वाला ग्रह है. इसका सीधा असर व्यक्ति के मन और संस्कारों पर पड़ता है इसलिए चन्द्रमा से बनने वाले एक एक योग इतने ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. चन्द्रमा से तीन प्रकार के शुभ योग बनते हैं – अनफा , सुनफा और दुरधरा और एक अशुभ योग भी बनता है – केमद्रुम. कुंडली में केमद्रुम योग हो तो बहुत सारे शुभ योग निष्फल हो जाते हैं. यह व्यक्ति को मानसिक पीड़ा और दरिद्रता देता है.
चन्द्रमा पृथ्वी पर सबसे ज्यादा असर डालने वाला ग्रह है. इसका सीधा असर व्यक्ति के मन और संस्कारों पर पड़ता है इसलिए चन्द्रमा से बनने वाले एक एक योग इतने ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. चन्द्रमा से तीन प्रकार के शुभ योग बनते हैं – अनफा , सुनफा और दुरधरा और एक अशुभ योग भी बनता है – केमद्रुम. कुंडली में केमद्रुम योग हो तो बहुत सारे शुभ योग निष्फल हो जाते हैं. यह व्यक्ति को मानसिक पीड़ा और दरिद्रता देता है.
कैसे बनता है केमद्रुम योग और इसका प्रभाव क्या होता है?
- चन्द्रमा के दोनों तरफ कोई ग्रह न हो
- तथा उस पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो , केमद्रुम योग बन जाता है
- ऐसी दशा में व्यक्ति को मानसिक रोग या मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है
- कभी कभी एपीलेप्सी जैसी समस्या भी हो जाती है
- व्यक्ति को दरिद्रता का सामना भी करना पड़ता है
- धन को लेकर खूब उतार चढ़ाव होते हैं
- इसके कारण व्यक्ति को माता का सुख नहीं मिलता
- केमद्रुम योग कर्क , वृश्चिक और मीन लग्न में ज्यादा ख़राब होता है
कब केमद्रुम योग भंग हो जाता है?
- जब चन्द्रमा से अष्टम या छठवे भाव में शुभ ग्रह हों
- जब कुंडली में शुभ ग्रह मजबूत हों
- जब केंद्र में केवल शुभ ग्रह हों
- जब बृहस्पति केंद्र में हो
- जब शुक्ल पक्ष में रात्रि का या कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो
केमद्रुम योग से बचने के उपाय क्या है?
- नित्य प्रातः माता के चरण स्पर्श करें
- अगर माँ न हों तो माता सामान स्त्री के चरण स्पर्श करें
- सोमवार को दूध , चावल या चीनी का दान करें
- शरीर पर चांदी जरूर धारण करें
- नित्य सायं “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः” का जाप करें
- हर महीने में एक बार शिवलिंग पर सफ़ेद चन्दन लगाएं और जल चढ़ाएं
- शिव जी की भक्ति से केमद्रुम योग निश्चित भंग हो जाता है अमावस्या :
ऋषि पाराशर के अनुसार अमावस्या को जिस भी जातक का जन्म हुआ है उसके आने के बाद घर में धीरे-धीरे दरिद्रता बढ़ती जाती है। अत: अमावस्या के दिन संतान का जन्म होने पर उचित रीति से शांति किए जाने का विधान है।
ज्योतिष के अनुसार कुंडली में जब सूर्य और चंद्र एक ही भाव में हो तब भी इस दोष का निर्माण होता है। लेकिन यह दोष अलग अलग भाव अनुसार अलग अलग फल देने वाला होता है। जैसे प्रथम भाव में यह युति बन रही है तो उसे अपने माता पिता से कभी सुख नहीं मिलता और अनबन बनी रहती है। जबकि 10वें भाव में होने पर जातक शारीरिक रूप से मजबूत होता है लेकिन उन्हें अपमान झेलते रहना पड़ता है।
यह भी कहा जाता है कि अमावस्या में जन्मा बच्चा व्याकुल, अस्थिर, आत्मबल से कमजोर, आलसी आदि होता है। यह भी कहा जाता है कि ऐसे जातक को भविष्य में स्त्री, पुत्र, कुल, धन आदि सम्बन्धी हानि उठानी पड़ती है। लेकिन यदि उस समय शुभ नक्षत्र है तो यह दोष कुछ हद तक दूर हो जाते हैं। अमावस्या तिथि में जब अनुराधा नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण होता है तो सर्पशीर्ष कहलाता है। सर्पशीर्ष में शिशु का जन्म दोष पूर्ण माना जाता है।
उल्लेखनीय है कि अमावस्या कई प्रकार की होती है और सभी का फल अलग अलग होता है। कुछ मुख्य अमावस्या:- भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या। ज्योतिष को कुंडली दिखवाकर ही उचित उपाय करें, क्योंकि उपरोक्त बताए गए भविष्यफल को नक्षत्र, करण, योग आदि के आधार पर भी देखा जाता है। अत: जरूरी नहीं कि अमावस्या को जन्मा बच्चा दरिद्रता लाए या मानसिक रूप से कमजोर हो या उसे जीवन में कई परेशानियां झेलना पड़े।
उपाय : इस दोष के निवारण हेतु कलश स्थापना करके उसमें पंच पल्लव, जड़, छाल और पंचामृत डालकर अभिमंत्रित करके अग्निकोण में स्थापना कर दें फिर सूर्य, चंद्रमा की मूर्ति बनवाकर स्थापना करें और षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजन करें। फिर इन ग्रहों की समिधा से हवन करें, माता-पिता का भी अभिषेक करें और दक्षिणा दें और इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराएं। किसी पंडित के सान्निध्य में ही यह पूजन विधिपूर्वक कराएं।
श्राद्ध कर्म करते रहने से भी यह शांति हो जाती है। सर्पशीर्ष योग में जन्म होने पर रुद्राभिषेक कराने के बाद ब्राह्मणों को भोजन एवं दान देना चाहिए। यदि जातक सोने या चांदी के तार की मूर्ति आदि नहीं बनवाने की क्षमता नहीं रखता है तो प्रतिकात्मक रूप से उक्त ग्रहों से संबंधित अन्य धातु या वृक्ष से यह मूर्ति बनाई जाती है।
इसके अलावा अमावस्या को जन्में जातक को हमेशा सफेद रंग का रूमाल अपने पास रखना चाहिए। अधिकतर मौकों पर सफेद वस्त्र पहनना चाहिए। गहरे रंगों से बचना चाहिए। अगर कुंडली में चंद्रमा लग्नेश का मित्र हो या शुभ भाव का स्वामी हो और नीच राशि या 6-8-12 मे ना हो तो चंद्रमा को बल देने के लिये मोती पहनना चाहिए। यदि किसी की कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो और 6-8-12 का स्वामी हो या नीच राशि पर हो तो उसे मोती नहीं पहनना चाहिए। पक्षियों को चावल या सफेद ज्वार डालना चाहिए। उसे सफेद वस्तु का दान करना चाहिए। चांदी के गोल लाकेट पर चंद्रमा बनवाकर गले में धारण करना चाहिए। लेकिन उपरोक्त सभी उपाय किसी ज्योतिष या पंडित से पूछकर ही करें।
शनि और चंद्रमा का विष योग :
जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ये योग बनता है तो उसे शारीरिक तौर परउसे कष्ट उठाना पड़ सकता है। ऐसे लोगों को जीवन में कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है। अगर किसी जातक की कुड़ली के लग्न में शनि-चंद्र के बैठ जाते हैं तो उसका प्रभाव और भी नकारात्मक होता है। घर में शांति की कमी आती है। एक- दूसरे के साथ झगड़े होने लगते हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह होती है लग्न, लग्न हमारे शरीर का प्रतिनिधित्व करता है अगर ये दशा शुरु होती है तो बहुत बुरा असर होता है।
विष योग को ज्योतिषी सबसे घातक मानते हैं। जिन लोगों का कुंडली में ये योग बनता है उसे सारी जिंदगी बिमारियों भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य आदि मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ज्योतिषियों का कहना है कि इस समय में कोई बुरा समाचार मिल सकता है। ऐसे समय में व्यक्ति को संयम बरतने की सलाह दी जाती है।
अगर किसी व्यक्ति के छठे भाव में शनि देव आते हैं तो एक्सिडेंट होने की संभावना बढ़ जाती है। वहीं अगर किसी व्यक्ति की कंडली के बारहवें भाव में शनि-चंद्र आ जाएं तो आय से बहुत अधिक बढ़ाकर खर्चा होता है। अगर शनि देवता की पूजा कि जाए तो शनि देवता की मार से बचा भी जाता है। कई ज्योतिषी लोगों को शनिवार को शनि देवता के मंदिर में जाकर पूजा करनी चाहिए। पूजा करने से कई मुसीबतों को हाल होता है।
सावन से जुड़ा है चंद्रमा का कनेक्शन, कुंडली में ऐसे करें मजबूत
सावन के महीने में वर्षा ऋतु का प्रभाव होता है. इस ऋतु का स्वामी चन्द्रमा को माना जाता है. खास बात यह है कि आज सावन का पहला सोमवार है और इस दिन का स्वामी भी चन्द्रमा ही होता है.
सावन के महीने में वर्षा ऋतु का प्रभाव होता है. इस ऋतु का स्वामी चन्द्रमा को माना जाता है. खास बात यह है कि आज सावन का पहला सोमवार है और इस दिन का स्वामी भी चन्द्रमा ही होता है.
चन्द्रमा की हर शक्ति के नियंत्रक भगवान शिव होते हैं और भगवान शिव ही चन्द्रमा की समस्या को दूर कर सकते हैं. यही वजह है कि सावन के सोमवार में भगवान शिव और चन्द्रमा की उपासना करने से चन्द्रमा से जुड़ी हर समस्या को दूर किया जा सकता है. सावन के सोमवार की रात्रि को चंद्रमा और शिव जी की उपासना करना विशेष फलदायी होता है.
क्या करें अगर कुंडली में चन्द्रमा संबंधी कोई समस्या हो तो-
- सबसे पहले स्नान करने के बाद भगवान शिव के समक्ष बैठें.
- भगवान शिव को अपनी उम्र के बराबर बेल पत्र अर्पित करें.
- इसके बाद रुद्राक्ष की माला से “ॐ चंद्रशेखराय नमः” का तीन माला जप करें.
- फिर “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः” का भी तीन माला जप करें.
- शिव जी से चन्द्रमा की समस्या दूर करने की प्रार्थना करें.
- जिस माला से मंत्र जप किया है, या तो उसे धारण कर लें या अपने पास हमेशा रख लें.
- ये उपाय सावन में किसी भी दिन रात्रि को करें.
चंद्रमा को मजबूत करने के लिए क्या करें-
- संध्याकाल में शिव जी के समक्ष बैठें.
- भगवान शिव को भांग, धतूरा और बेल पत्र अर्पित करें.
- इसके अलावा भोलेनाथ को एक चांदी का अर्धचन्द्र भी अर्पित करें.
- इसके बाद शिव जी के मंत्र “ॐ आशुतोषाय नमः” का जाप करें.
- फिर चन्द्रमा के मंत्र “ॐ सोम सोमाय नमः” का जाप करें.
- पूजा समाप्ति के बाद अर्धचन्द्र को गले में धारण कर लें
सावन में और किन उपायों से चन्द्रमा मजबूत होगा ?
- सावन में नियमित रूप से शिवलिंग पर चन्दन अर्पित करें.
- निर्धनों को सफेद मिठाई या खीर का दान करें.
- चांदी की वस्तु या मोती सलाह लेकर धारण करें.
- नित्य रात्रि को चन्द्रमा के मंत्र का जप करें.
चंद्रमा क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर विराजित :
पौराणिक कथानुसार चंद्र का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं के साथ संपन्न हुआ। चंद्र एवं रोहिणी बहुत खूबसूरत थीं एवं चंद्र का रोहिणी पर अधिक स्नेह देख शेष कन्याओं ने अपने पिता दक्ष से अपना दु:ख प्रकट किया।
दक्ष स्वभाव से ही क्रोधी प्रवृत्ति के थे और उन्होंने क्रोध में आकर चंद्र को श्राप दिया कि तुम क्षय रोग से ग्रस्त हो जाओगे। शनै:-शनै: चंद्र क्षय रोग से ग्रसित होने लगे और उनकी कलाएं क्षीण होना प्रारंभ हो गईं। नारदजी ने उन्हें मृत्युंजय भगवान आशुतोष की आराधना करने को कहा, तत्पश्चात उन्होंंने भगवान आशुतोष की आराधना की।
चंद्र अंतिम सांसें गिन रहे थे (चंद्र की अंतिम एकधारी) कि भगवान शंकर ने प्रदोषकाल में चंद्र को पुनर्जीवन का वरदान देकर उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया अर्थात चंद्र मृत्युतुल्य होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। पुन: धीरे-धीरे चंद्र स्वस्थ होने लगे और पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्र के रूप में प्रकट हुए।
चंद्र क्षय रोग से पीड़ित होकर मृत्युतुल्य कष्टों को भोग रहे थे। भगवान शिव ने उस दोष का निवारण कर उन्हें पुन:जीवन प्रदान किया अत: हमें उस शिव की आराधना करनी चाहिए जिन्होंने मृत्यु को पहुंचे हुए चंद्र को मस्तक पर धारण किया था।
Moti Stone Benefits:
ज्योतिष शास्त्र में मोती को एक महत्वपूर्ण रत्न माना गया है. मोती का संबंध चंद्रमा से है. ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है. जिन लोगों का चंद्रमा अशुभ या कमजोर होता है, उन्हें मोती धारण करने की सलाह दी जाती है. आइए जानते हैं मोती पहने के क्या फायदे होते हैं और इसे कब धारण करना चाहिए-
लक्ष्मी जी को प्रिय है मोती
मान्यता के अनुसार मोती लक्ष्मी जी को बहुत प्रिय है. इसीलिए दिवाली पर लक्ष्मी पूजन में मोती का भी प्रयोग किया जाता है. मोती पहनने से लक्ष्मी जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है. जिन लोगों के जीवन में धन की कमी या इससे जुड़ी कोई परेशानी बनी हुई है तो मोती धारण करना चाहिए.
मोती कितने प्रकार के होते हैं
मोती के आठ प्रकार बताए गए हैं. इन आठ प्रकार के मोतियों के नाम ये हैं-
अभ्र मोती
शंख मोती
सर्प मोती
गज मोती
शुक्ति मोती
बांस मोती
शूकर मोती
मीन मोती
मोती की माला
गोल मोती की माला पहनना है सबसे उत्तम माना गया है. मोती का संबंध चंद्रमा से है. इसलिए इसे धारण करने से पूर्व जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति का आंकलन अवश्य कर लेना चाहिए. मोती को उंगली में भी धारण किया जा सकता है. मोती को दाहिने हाथ की कनिष्ठा उंगली में धारण करने की सलाह दी जाती है. चांदी के साथ मोती को धारण अच्छा माना गया है.
मोती पहनने के फायदे
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति को क्रोध अधिक आता है, उसे मोती धारण करना चाहिए. इसके साथ ही मन स्थिर नहीं रहता है, अज्ञात भय की स्थिति बनी रहती है तो मोती धारण कर सकते हैं.
मोती कब धारण करना चाहिए
मोती शुक्ल पक्ष के सोमवार को धारण करना शुभ माना गया है.
चंद्रमा के 10 ऐसे खुलासे जो आपको रोमांचित कर देंगे ( Science Facts) :
सौरमंडल का 5वां सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक है। पृथ्वी से लगभग 3,84,365 किलोमीटर दूर चंद्रमा का धरातल असमतल है और इसका व्यास 3,476 किलोमीटर है तथा द्रव्यमान, पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/8 है। पृथ्वी के समान इसका परिक्रमण पथ भी दीर्घ वृत्ताकार है। सूर्य से परावर्तित इसके प्रकाश को धरती पर आने में 1.3 सेकंड लगता है।
- चंद्र ग्रह नहीं, उपग्रह है : ग्रह और उपग्रह में फर्क होता है। चंद्रमा धरती का एक उपग्रह है। इसी तरह शनि, बृहस्पति और प्लूटो आदि ग्रहों के भी उपग्रह अर्थात चांद है। वैज्ञानिकों के अनुसार चांद से भी बड़े उपग्रह सौर जगत में मौजूद हैं जिनमें से सबसे बड़ा बृहस्पति ग्रह के पास कलिस्टो स्थित है। इसके अलावा शनि का टाइटन और ईओ भी चंद्रमा से बड़े हैं। चंद्र को जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है।
- कैसे बना चंद्रमा : चंद्रमा लगभग 4.5 करोड़ वर्ष पूर्व धरती और थीया ग्रह (मंगल के आकार का एक ग्रह) के बीच हुई भीषण टक्कर से जो मलबा पैदा हुआ, उसके अवशेषों से बना था। यह मलबा पहले तो धरती की कक्षा में घूमता रहा और फिर धीरे-धीरे एक जगह इकट्टा होकर चांद की शक्ल में बदल गया। अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए पत्थरों की जांच से पता चला है कि चंद्रमा और धरती की उम्र में कोई फर्क नहीं है। इसकी चट्टानों में टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक पाई गई है।
- क्या है चंद्रमा पर : चंद्रमा की खुरदुरी सहत पर बेहद अस्थिर और हल्का वायुमंडल होने की संभावना व्यक्त की जाती है और यहां पानी भी ठोस रूप में मौजूद होने के सबूत मिले हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायुमंडलविहीन उपग्रह है। नासा के एलएडीईई प्रोजेक्ट के मुताबिक यह हीलियम, नीयोन और ऑर्गन गैसों से बना हुआ है। चंद्रमा का सबसे बड़ा पर्वत दक्षिणी ध्रुव पर स्थित लीबनिट्ज पर्वत है, जो 35,000 फुट (10,668 मी.) ऊंचा है।
- कैसा है चंद्रमा का वातावरण : यहां का वातावरण एकदम शांत है लेकिन यहां तापमान में भारी मात्रा में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। चंद्रमा की सतह पर धूल का गुबार सूर्योदय और सूर्योस्त के समय मंडराता रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका एक कारण अणुओं का इलेक्ट्रिकली चार्ज होना हो सकता है। ऐसा सूर्य वाली दिशा में ही होता है। यहां की धूल चिपचिपी है जिसके चलते वैज्ञानिकों के उपकरण खराब हो जाते हैं। यदि कोई अंतरिक्ष यात्री वहां जाएगा तो उसके कपड़ों पर धूल जल्दी से चिपक जाएगी और फिर उसे निकालना मुश्किल होता है।
दूसरी ओर चंद्रमा के पिछले भाग की धूल के मैदान को शांतिसागर कहते हैं, जो अंधकारमय है। चन्द्रमा, पृथ्वी की 1 परिक्रमा लगभग 27 दिन और 8 घंटे में पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष पर एक घूर्णन करता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई पड़ता है।
- गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम है : चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति धरती से कम है इसलिए वहां पर मनुष्य का वजन लगभग 16.5 प्रतिशत कम हो जाता है। यदि कारण है कि व्यक्ति वहां