ब्रह्मांड में ग्रहों के राजा के रूप सूर्यदेव स्थित है सूर्य देव साक्षात अक्षय ऊर्जा के स्रोत हैं सारे ग्रह सूर्यदेव के आस-पास ही रहते है जो भी ग्रह सूर्यदेव के अधिक निकट आ जाता है वह ग्रह अस्त हो जाता है, वे अस्त ग्रह अपना सार्थक या निरर्थक प्रभाव देने में असमर्थ हो जातें है कोई भी ग्रह जब अस्त होता है तब उसकी क्षमता शक्ति न्यून हो जाती है और जन्मकुंडली के जिस भी भाव मे अस्त ग्रह स्थित होता है उससे संबंधित फल में न्यूनता आ जाती है उसी संदर्भ में आज यह पोस्ट है गुरुतुल्य वंदनीय आचार्य जनो से करबद्ध प्रार्थना है मेरी त्रुटियों के लिए क्षमा कर अपने अनुभव प्रसाद से अनुग्रहित कर मेरी त्रुटियों पर प्रकाश डालकर ज्ञानवर्धन में मेरी सहायता करें ताकि इस पोस्ट पर आने वाले ज्योतिष प्रेमी, विद्यार्थी वर्ग, जातक वर्ग, जिज्ञासु वर्ग इसका अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकें।
सबसे पहले चंद्र देव की बात करतें है।
चंद्र देव जब सूर्यदेव से 12 अंश या इससे अधिक समीप आ जातें है तो अस्त हो जातें है जिसके फलस्वरूप जातक के जीवन मे अशांति आने लगती है, माता का स्वास्थ्य ठीक नही रहता, माता के रिश्ते विगड़ने की संभावना बढ़ जाती है, अस्त चंद्र अष्टम भाव या अष्टमेश के साथ हो तो जातक काफी समय के लिए अवसाद ग्रस्त हो सकता है, चंद्र देव के अस्त होने से विभिन्न प्रकार के रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती है जैसे गले के रोग, अस्थमा, फेफड़े के रोगादि।
मंगल देव जब अस्त हो तो।
मंगल देव जब सूर्य से 17 अंश या इससे अधिक समीप आ जाते है तो अस्त हो जातें है जिसके फलस्वरूप पराक्रम व साहस में कमी, क्रोध में वृद्धि, भाइयो से तनाव, भूमि व प्रॉपर्टी के विवाद, नसों में दर्द, दुर्घटनाए, मुकदमे, पत्नी को शारीरिक कष्ट, फोर्स से जुड़े लोगों को विशेष कष्टों का सामना करना पड़ सकता है, मंगल षष्ठेश होकर पापी ग्रहों से दृष्ट हो तो दुर्घटना और रोग की संभावनाएं अधिक बढ़ जाती है, मंगल द्वादशेश होकर अस्त हो तो जातक नशीले पदार्थो का सेवन भी करने लग जाता है कुछ मामलों में कर्ज की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
बुध देव जब अस्त हो तो।
बुध देव जब सूर्य से 13 अंश या इससे अधिक समीप आ जाते है तो अस्त हो जाते है यदि बुध देव वक्री हो तो 11 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाते है फलस्वरूप विस्वास की कमी, शरीर मे ऐंठन, स्वास व चर्म और गले के रोग, दिमागी भ्रम, काम मे मन न लगना, द्वादशेश से संबंध हो तो नशीले पदार्थो के सेवन करवाता है और धन का अधिक व्यय नशीले पदार्थो के सेवन में करवाता है।
बुध देव को अस्त होने का दोष नही लगता ऐसा भी माना जाता है किंतु बुध देव के पीड़ित, अस्त होने पर उपरोक्त फल देखे जातें है ऐसा अनुभव में आया है।
गुरु देव जब अस्त हो तो।
गुरु देव जब सूर्य देव से 11 अंश या इससे अधिक समीप आ जातें है तो अस्त हो जाते है फलस्वरूप गुरु की महादशा में उदर रोग, टाइफाइड, मधुमेह, बच्चों में पढ़ाई के प्रति लगाव न होना, मुकदमो में फसना, संतान उत्तपत्ति में बाधा, शिक्षा में बाधा, बुजुर्गों को कष्ट व ईश्वर के प्रति श्रद्धा में कमी देखने को आता है।
शुक्र देव जब अस्त हो तो।
शुक्र देव जब सूर्य देव से 9 अंश या इससे अधिक समीप आ जाते है तो अस्त हो जाते है शुक्र देव यदि वक्री हो तो 7 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाते है फलस्वरूप स्त्रियों को गर्भाशय के रोग, नेत्र रोग, किडनी रोग, गुप्त रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती है, अस्त शुक्र जब राहु केतु के प्रभाव में आ जाये तो जातक के मान सम्मान में कमी और अपमान सहन करना पड़ सकता है, अस्त शुक्र षष्ठेश के साथ हो तो किडनी, मूत्राशय व यौनांगों के विकार उत्तपन्न कर सकता है अस्त शुक्र विवाह में बाधा व दाम्पत्य सुख का अभाव दे सकता है।
शनि देव जब अस्त हो तो।
शनि देव जब सूर्य देव से 15 अंश या इससे अधिक समीप आ जातें है तो अस्त हो जातें है, फलस्वरूप कमर दर्द, स्नायु तंत्र के रोग, अस्त शनि यदि षष्ठेश के साथ संग्रस्त हो तो रीढ़ की समस्या दे सकता है रोजगार में समस्या, नौकरी में मालिक के साथ तनाव की स्थिति बन सकती है, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, नशीले पदार्थो का आदि बना सकता है।
राहु केतु छाया ग्रह होने के नाते अस्त नही होते अपितु सूर्य देव को ग्रहण दोष लगा देते है।
उपरोक्त व्याख्या पर अनुभवी गुरुजनों विद्वानों के मत का स्वागत करते हुए लेख का समापन करतें है।